हरिद्वार। जगद्देव संस्कृत महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य और व्याकरणाचार्य आचार्य बुद्धि वल्लभ का 91 वर्ष की उम्र में आज देहावसान हो गया। देश के मूर्धन्य संस्कृत विद्वानों की पहली पंक्ति में शामिल आचार्य जी ने सप्तर्षि हरिद्वार में महाविद्यालय के प्राचार्य के रूप में अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत किया। सन 1981 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सरकार के द्वारा संस्कृत शिक्षकों की घोर उपेक्षा को लेकर आपने 21 दिन तक लखनऊ में अनशन किया जिसमें मिले अपार जन समर्थन को देखकर इंदिरा गांधी सरकार हिल गई और आचार्य जी को राष्ट्रपति पुरस्कार देने की सिफारिश की। लेकिन आचार्य जी ने कहा कि यदि कुछ करना है तो संस्कृत जगत के लिए करें और यह कहकर राष्ट्रपति पुरस्कार ठुकरा दिया।
सन 1935 मे पौड़ी गढवाल के यमकेश्वर विकासखंड के ग्राम आमडी मल्ली मे ज्योतिषाचार्य पंडित रविदत्त कपरूवान के प्रथम पुत्र के रूप मे जन्मे स्वनामधन्य आचार्य बुध्दिबल्लभ ने शांतिकुंज के संस्थापक आचार्य श्रीराम शर्मा के ग्रंथों का संस्कृत में लेखन किया।राम जन्मभूमि आन्दोलन में आचार्य जी के नेतृत्व मे जनजागरण का अभूतपूर्व कार्य किया गया।इसको लेकर एक एक घर तक एक एक परिवार को जोडने कार्य हुआ। आचार्य जी के निधन से संस्कृत जगत का एक दैदिप्यमान सूर्य अस्त हो गया। आचार्य बुध्दिबल्लभ को उनके पुत्र डाक्टर द्विजेन्द्र वल्लभ और पौत्र कीर्ति वल्लभ ने मुखाग्नि दी।इस अवसर पर डाक्टर ओमप्रकाश भट्ट ,दिवाकर बडोला, प्रेम लाल शर्मा, सत्येंद्र धमाॅदा, कवि प्रसाद शर्मा, मनोज जखमोला ,आचार्य वेणी प्रसाद शर्मा ,अनुसूया प्रसाद कपरूवान ,नवीन शर्मा, वेद किशोर शर्मा ,दीनदयाल कपरूवान, महावीर कपरूवान, विनोद शर्मा, गौरीशंकर भट्ट,भास्कर प्रसाद शर्मा ,दिवाकर शर्मा ,प्रभाकर शर्मा के साथ सोनीपत के साॅसद सतपाल ब्रह्मचारी ने श्रद्धा-सुमन अर्पित किये। समस्त डोब्रे न्यूज परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धाॅजलि।







